ब्रह्मसम्बंध फल रूप कैसे बने ?
जो एक समय पंचोली जी ने श्री गोकुलनाथजी सु पूछ्यो “ राज आप तो पांच सात वैष्णवो को एक संग तुलसी दल देय के ब्रह्मसम्बंध दो ।
सो वामें सु कोऊ उत्तम भगवदीय होय ।
कोऊ मध्यम वैष्णव होय ।
कोऊ को भाव उपजत ही नाही ।
सो एसो क्यों ?
सो आपश्री ने आज्ञा करी के जो निवेदन पांच प्रकार सु फल रूप होय।
१.गुरु की कृपा पूर्ण रूप सु होय।
२.जीव स्वयं उद्यम करे शरणागत होय ।
३.कोऊ भगवदीय की कृपा वापे होय ।
४.साक्षात पूर्ण पुरषोत्तम की वापे कृपा होय ।
५.श्री स्वामीनिजी की वापे कृपा होय ।
सो यामे दो कृपा तो कठिन जाननी ।
एक भगवदीय की और दूसरी श्री स्वामिनिजी की ।
सो पुरषोत्तम सो अठारह वसा है और श्री स्वामीनिजी बाविस वसा है ।
सो श्री प्रभु से हू सवाये है ।
सो उनकी कृपा सु ही जीव को परम फल की प्राप्ति होय ।
जो कोऊ भगवदीयके संग सु ही सत्संग मिले ।
सो सत्संग सु ही विवेक आवे ।
विवेक सु आश्रय दृढ होय ।
आश्रय सु ही दीनता प्रकट होय ।
दैन्य भाव सु ही अहंकार जाय ।
और जब अहंकार जाय सो ही श्री स्वामीनिजी को प्रिय होय ।
सो एसो करी के जाननो ।