कंकणावृति सूर्यग्रहण रविवार दिनांक २१-०६-२०२० पर

।। विजयते श्रीमन्मथुराधीशप्रभु: ।।


 


शंख-चक्र-गदाधारी,श्रीमथुराधीशप्रभु:।


करुणग्राम नदी कूलात् स्वयं प्रादुर्बभूव य:।


पद्मनाभ मन: कामं, पूरयिता तनुरूपधृत्।


पातुनोsसँख्यान् जीवान्, केवलं कृपया तया।


 


नमो भगवते तस्मै कृष्णायाद्भुतकर्मणे ।


रूपनाम विभेदेन जगत् क्रीडति यो यत:।।


 


अद्भुत लीला करने वाले श्रीकृष्ण ही रूप नाम के भेद से जगत में क्रीड़ा कर रहे हैं। अतः जगत में चल रही प्रत्येक घटना उनकी इच्छानुसार ही घट रही है। जिस प्रकार मनुष्य के जीवन में घटती घटनाएं कभी अच्छी होती हैं तो कभी बुरी परन्तु जीव अपनी प्रत्येक क्रियाओं का अवसान सुख में ही चाहता है , प्राणिमात्र सुख का ही आकांक्षी है किंतु सुख और दुख की परिभाषा हरेक व्यक्ति के दृष्टिकोण से अलग- अलग होती है। स्वानुकूल ही सुख है स्वविपरीत ही दुख है। ' सर्वं परवशं दुःखं सर्वं आत्मवशं सुखं'( मनुस्मृति4/160) 


यह वर्तमान समय मानव मात्र के विपरीत चल रहा है जहाँ विपरीत परिस्थितियों का सर्जन होता है वहीं दुख प्रकट होता है। कुछ विपरीत परिस्थितियों को हम अपने कर्मानुसार अपने अनुकूल कर सकते हैं किन्तु कुछ परिस्थितियां मानव के हाथ में नहीं। जब परिस्थितियां मनुष्य के हाथ से निकलने लगती हैं तब उसका सत्वगुण कमजोर पड़ जाता है, तमोगुण उस पर हावी हो जाता है, मानसिक व्यग्रता एक घनघोर परिस्थिति उत्पन्न कर देती है। कोरोना विषाणु की वजह से सभी के जीवन में कुछ न कुछ परेशानी आई हैं, परन्तु जिनका सात्विक चिंतन है , जिनका धर्ममय आचरण है , जिनका वैष्णवीय जीवन है ऐसे वैष्णवजनों ने इस परिस्थिति को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा। बार-बार महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य की शिक्षा उनके काम आई जैसे कि- ' चिंता कापि न कार्या निवेदितात्मभि: कदापीति-----, तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत् -----, सर्वं समर्पितं भक्त्या कृतार्थोसि सुखी भव -----, विवेकस्तु हरि: निजेच्छात: करिष्यति ----, त्रिदु:ख सहनम् धैर्यम् आमृते: सर्वत: सदा-----, कृष्ण एव गतिर्मम ----। 


*जिनके ह्रदय में यह वल्लभ की वाणी गूंज रही थी उन्हें परिस्थिति विपरीत होते हुए भी मानसिक शान्ति थी क्योंकि धर्म देह के साथ - साथ मन से अधिक जुड़ा हुआ होता है। मैं आशा करता हूँ कि आपका विश्वास , आपकी दृढ़ता , आपका भगवदाश्रय इस कोरोना काल में बढ़ा ही होगा क्योंकि सर्वत्र नकारात्मक ऊर्जा के प्रसार से भौतिक स्थिति विपरीत लग रही है एवं इस कोरोना काल के साथ ग्रहण का काल भी आ रहा है। सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण धार्मिक लोगों के लिए विपरीत घटना का प्रकार है अर्थात् ग्रहण काल में सर्वत्र एक नकारात्मक ऊर्जा व्याप्त हो जाती है उस नकारात्मक ऊर्जा से बचने के लिए हम शास्त्रीय विधानों का आश्रय लेते हैं।एक तो पहले से ही कोरोना विषाणु ने नकारात्मकता फैला रखी है ऐसे समय में ग्रहण का आना और अधिक नकारात्मकता को कहीं प्रबल न कर दे , जिस प्रकार आजकल चिकित्सक कह रहे हैं अगर कोरोना से बचना है तो अपनी रोग प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि करें और यह तो सभी को मालूम है कि इम्यूनिटी मन के प्रसन्न रहने पर बढ़ती है और प्रसन्नता सकारात्मक सोच से ही आती है। 


 


आधुनिक समय में लोग सकारात्मक ऊर्जा के लिये पॉजिटिव थिंकिंग पर बहुत जोर देते हैं। सकारात्मक विचारों का सम्बन्ध सीधे मन से है, शरीर से नहीं। पॉजिटिव थिंकिंग के इस विषय पर अनेक पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। लोगों ने अनेक पुस्तकों को पढ़ा भी होगा परन्तु वो पॉजिटिव थिंकिंग नहीं आ पाई। 


यह बड़े दुख की बात है कि हमें आधुनिक पुस्तकों पर ज्यादा विश्वास है। हमने अपनी प्राचीन धरोहर श्रीमद्भगवद्गीता पर कभी ध्यान नहीं दिया कि किस प्रकार अर्जुन के नकारात्मक विचारों को भगवान श्रीकृष्ण ने सकारात्मक विचारों में परिवर्तित कर दिया । हम आधुनिकता में इतने खो गए हैं कि लोग पश्चिम के विचारकों की पुस्तकों को पढ़ेंगे परन्तु श्रीमद्भगवद्गीता को हाथ नहीं लगायेंगे, आज कल हमें धार्मिक आचरण अप्रासंगिक लगता है बहुत पुरानी सोच लगती है, वर्तमान में हमारे सुख का साधन आधुनिक विज्ञान और उसके आविष्कार बन गए हैं, इसलिए हम धर्म को भी विज्ञान के तराजू में ही तोलते हैं, ईश्वर को भी वैज्ञानिक तर्क कुतर्कोँ द्वारा प्रामाणित करने की कोशिश करते हैं, सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण के विषय में भी कुछ लोगों का यही मानना है कि ग्रहण तो मात्र एक खगोलीय घटना है जो निरन्तर समय के अंतराल पर स्वयं घटती है, हमने अपने मूल धर्म को विस्मृत कर दिया इसलिए ऐसे विचार आते हैं, विज्ञान के विकास ने हमारी आध्यात्मिक बुद्धि के विकास को रोक दिया है, विज्ञान का कोई अंतिम सिद्धान्त नहीं यह एक निरन्तर चलने वाली यात्रा है आज जो आधुनिक विज्ञान के नियम हैं हो सकता है कि कल वो बदल जाएं परन्तु धार्मिक नियम शाश्वत हैं जो बदलते नहीं, क्योंकि धार्मिक ज्ञान की यात्रा अंतर्मुखी है और आधुनिक विज्ञान की यात्रा बाह्य विकास की है किन्तु प्रकृति के विनाश के साथ। वर्तमान में कोरोना विषाणु प्रकृति के विरुद्ध विनाशक विचारों का नतीजा है, एक छोटे से विषाणु के सामने समस्त जगत हार गया, एक छोटे से विषाणु से विज्ञान भी पराजित हो गया है।


 


मेरे यह सब कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं कि हम आधुनिक विज्ञान को माने ही नहीं मेरा मानना यह है कि हम विज्ञान के साथ साथ वैदिक शाश्वत ज्ञान को भी जीवन का अंग बनायें अपितु वैदिक ज्ञान हमारे सबके जीवन का मुख्य अंग बने जो पहले था। विज्ञान की पहोंच शरीर तक सीमित है और वैदिक ज्ञान की पहोंच मन और आत्मा से लेकर परमात्मा तक है।अगर हमें मन को प्रसन्न करना है, और मन में सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करनी है तो वैदिक धर्म की शरण में आना ही होगा,हमें शास्त्रों के प्राचीन ज्ञान द्वारा ग्रहण जैसी घटनाओं का तात्पर्य जानना होगा कि इन घटनाओं का क्या संकेत है!! अतः आगामी ग्रहण का वैदिकधर्मानुसार शास्त्रीय क्रम हमने अपनी व्रतोत्सव की टिप्पणी में पृष्ठ क्रमांक 37,38,39 पर दिया है।


 


 उस वैदिक क्रम के साथ हम अपना पुष्टिमार्गीय भावात्मक क्रम का भी आचरण करें भगवत्सन्मुख कितर्नादि द्वारा। ग्रहण के विषय में टिप्पणीजी में विस्तार से लिख दिया है इसलिए यहाँ विस्तार से नहीं कह रहा हूँ। ग्रहण में वैदिक क्रम के साथ - साथ साम्प्रदायिक क्रम करते हुए मान एवं माहात्म्य आदि के कीर्तन द्वारा हम ग्रहण के इस काल को भी भक्तिमय बना दें। भगवद् कीतर्नादि के द्वारा अपने मन को प्रसन्न रखें। वैदिक क्रम दानादि के द्वारा एक परोपकार की भावना अपने मन में प्रकट करें । 


 


कोरोना काल ने हमें यह शिक्षा दी है कि हम पुनः अपने मूल वैदिक साम्प्रदायिक धर्मों से दृढतया जुड़ें। कोरोना एवं ग्रहण की इस द्विगुणित नकारात्मक ऊर्जा को हम शास्त्रीय सदाचरण से एवं श्रीवल्लभ वाणी द्वारा सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर दें। तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिंताम् द्रुतम् त्यजेत्-------- तुरंत समस्त चिंताओं का परित्याग करते हुए अतस्तु ब्रह्मवादेन कृष्णे बुद्धि: विधीयताम्------- प्रभु में ब्रह्मवाद अर्थात् सब कुछ यह प्रभु की लीला ही है इस भाव से अपने मन को सदा प्रसन्न रखें । ग्रहण काल में अधिक से अधिक भगवद् नाम ह्रदय में ग्रहण करें। 


कृष्णनाम परं पुण्यं कृष्णनाम परं फलम्। 


कृष्णनाम परोधर्म: कृष्णनाम परं तप:।


कृष्ण एव गतिर्मम......


किमधिकम्


 


गोस्वामी 


मिलनकुमार


शुद्धाद्वैत प्रथमपीठ (कोटा)


 


‌ *कंकणावृति सूर्यग्रहण*


 


संवत् २०७७ शक: १९४२ आषाढ़ कृष्ण अमावस्या रविवार दिनांक २१-०६-२०२० के दिन सूर्यग्रहण होयगो।


या दिन कोटा में दिनमान ११ घड़ी सूर्योदय स्टान्डर्ड टाइम ५ बजके ३८ मिनिट, सूर्यास्त शाम ७ बजके १८ मिनिट कोटा में नवीन गणित के प्रमाण सूं , स्पर्श दिन में १० बजके १२ मिनिट को, मध्य ११ बजके ५४ मिनिट को, मोक्ष दुपहर को १ बजके ४३ मिनिट पे होयगो।


पर्वकाल ३ घण्टा ३१ मिनिट को है। 


यह ग्रहण दिन के दूसरे प्रहर में होंने से सूर्यास्त के एक प्रहर पीछे चतुर्दशी शनिवार २०-०६-२०२० को सूर्यास्त के पश्चात रात्रि १० बजकर १८ मिनिट सूं वेध लगे है।


 तासुं शनिवार रात्रि १० बजकर १८ मिनिट पूर्व ही प्रसाद लियो जायेगो। 


रविवार सुबह ०५ बजकर ३८ मिनिट पूर्व ही जल पियो जायेगो। 


बिना जनेऊ के बालक तथा छोटी कन्या, वृद्ध, अशक्त और सगर्भा स्त्री रविवार सुबह ०५ बजकर ३८ मिनिट के पूर्व प्रसाद ले सकेंगे। 


दिनांक २१ रविवार के दिन राजभोग पर्यंत सेवा ९ बजके ३० मिनिट पूर्व तक हो जाय। 


राजभोग की सखड़ी गायन कुं जाय।  


सेवा में सुपेदी सब कोरी राखनी।


 रसोई, बालभोग आदि सब स्थल तथा पात्रन कि शुद्धि ग्रहण में जैसी होती वेसी करनी।


 सर्वत्र दर्भ धरनों। 


श्री...... को अनवसर नही होय।


 अनवसर के भोग साज, शय्या प्रभूति उठ जाय और खासा हो जाय। 


स्पर्श सूं चारके मिनिट पूर्व झारी बंटा हूं पट्ट वस्त्र सूं उठावने दर्शन खोलिके जपादि करने।


 ११ बजके ५४ मिनिट के पीछे श्री.... के आगे दान संकल्प करनो खिचड़ी को डबरा धृत दक्षिणा सहित प्रायः सर्वत्र दियो जाय है।  


प्रत्यक्ष अथवा निष्क्रिय द्वारा गोदान जहां जैसों होतो होय वहां वैसो कियो जाय। 


मनुष्य भी यथाशक्ति दानादिक अवश्क करे।


 मोक्ष भये पीछे चार पाँच मिनिट ठहर के स्नानादि करने। 


शुद्ध होय नवीन जल सूं झारी भरनी श्री... कूं स्नान करवाय ग्रहण पीछे को अनसखड़ी भोग संग ही धरनों। 


नित्य प्रमाणे संध्या शयन पर्यन्त की सेवा करनी। अनवसर कर यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन, वैष्णव भोजन पूर्वक प्रसाद लेनो।


 


*कोटा*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


 


समय-- १०:१२ ११:५४ १३:४३ ३:३१


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:१८*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०५:३८*


 


                  *जतीपुरा*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:२० १२:०१ १३:४८ ३:२८


  


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:२०*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०५:२५*


 


                  *मुंबई*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:०१ ११:३८ १३:२८ ३:२७


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:२०*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०६:०२*


 


     *कलकता*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:४३ १२:३५ १४:१७ ३:३१


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: ०९:२२*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०४:५६*


 


*कंकणावृति सूर्यग्रहण*


 


संवत् २०७७ शक: १९४२ आषाढ़ कृष्ण अमावस्या रविवार दिनांक २१-०६-२०२० के दिन सूर्यग्रहण होयगो।या दिन कोटा में दिनमान ११ घड़ी सूर्योदय स्टान्डर्ड टाइम ५ बजके ३८ मिनिट, सूर्यास्त शाम ७ बजके १८ मिनिट कोटा में नवीन गणित के प्रमाण सूं , स्पर्श दिन में १० बजके १२ मिनिट को, मध्य ११ बजके ५४ मिनिट को, मोक्ष दुपहर को १ बजके ४३ मिनिट पे होयगो।पर्वकाल ३ घण्टा ३१ मिनिट को है। यह ग्रहण दिन के दूसरे प्रहर में होंने से सूर्यास्त के एक प्रहर पीछे चतुर्दशी शनिवार २०-०६-२०२० को सूर्यास्त के पश्चात रात्रि १० बजकर १८ मिनिट सूं वेध लगे है।तासुं शनिवार रात्रि १० बजकर १८ मिनिट पूर्व ही प्रसाद लियो जायेगो। रविवार सुबह ०५ बजकर ३८ मिनिट पूर्व ही जल पियो जायेगो। बिना जनेऊ के बालक तथा छोटी कन्या, वृद्ध, अशक्त और सगर्भा स्त्री रविवार सुबह ०५ बजकर ३८ मिनिट के पूर्व प्रसाद ले सकेंगे। दिनांक २१ रविवार के दिन राजभोग पर्यंत सेवा ९ बजके ३० मिनिट पूर्व तक हो जाय। 


राजभोग की सखड़ी गायन कुं जाय।सेवा में सुपेदी सब कोरी राखनी।रसोई, बालभोग आदि सब स्थल तथा पात्रन कि शुद्धि ग्रहण में जैसी होती वेसी करनी।सर्वत्र दर्भ धरनों। श्री...... को अनवसर नही होय।अनवसर के भोग साज, शय्या प्रभूति उठ जाय और खासा हो जाय। स्पर्श सूं चारके मिनिट पूर्व झारी बंटा हूं पट्ट वस्त्र सूं उठावने दर्शन खोलिके जपादि करने।११ बजके ५४ मिनिट के पीछे श्री.... के आगे दान संकल्प करनो खिचड़ी को डबरा धृत दक्षिणा सहित प्रायः सर्वत्र दियो जाय है।प्रत्यक्ष अथवा निष्क्रिय द्वारा गोदान जहां जैसों होतो होय वहां वैसो कियो जाय।मनुष्य भी यथाशक्ति दानादिक अवश्क करे।मोक्ष भये पीछे चार पाँच मिनिट ठहर के स्नानादि करने।शुद्ध होय नवीन जल सूं झारी भरनी श्री... कूं स्नान करवाय ग्रहण पीछे को अनसखड़ी भोग संग ही धरनों।नित्य प्रमाणे संध्या शयन पर्यन्त की सेवा करनी। अनवसर कर यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन, वैष्णव भोजन पूर्वक प्रसाद लेनो।


 


*कोटा*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:१२ ११:५४ १३:४३ ३:३१


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:१८*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०५:३८*


 


*जतीपुरा*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:२० १२:०१ १३:४८ ३:२८


  


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:२०*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०५:२५*


 


*मुंबई*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:०१ ११:३८ १३:२८ ३:२७


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: १०:२०*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०६:०२*


 


*कलकता*


स्टे. टा.-- स्पर्श मध्य मोक्ष पर्वकाल


समय-- १०:४३ १२:३५ १४:१७ ३:३१


 


*अन्नवेध: तारीख २०-०६-२०२० शनिवार रात्रि: ०९:२२*


*जलवेध: तारीख २१-०६-२०२० रविवार सुबह: ०४:५६*