।। विजयते श्रीमन्मथुराधीशप्रभु: ।।
शंख-चक्र-गदाधारी,श्रीमथुराधीशप्रभु:।
करुणग्राम नदी कूलात् स्वयं प्रादुर्बभूव य:।
पद्मनाभ मन: कामं, पूरयिता तनुरूपधृत्।
पातुनोsसँख्यान् जीवान्, केवलं कृपया तया।
आज माई रथ बैठे गिरिधारी ।
वामभाग वृषभान नन्दिनी पहरे कसुंभी सारी ।
समस्त पुष्टिपथ पथानुगामी श्रीमद्वल्लभ चरणानुरागी समस्त वैष्णवों को एवं प्रथमेश गृह के निजजन वल्लभीयजन को प्रभु के रथोत्सव की अति मङ्गलमयी वधाई। रथयात्रा वैसे तो मर्यादामार्गीय उत्सव है परन्तु स्वमार्ग में इसे पुष्टिमार्गीय प्रणाली के अनुरूप मनाया जाता है क्योकि स्वमार्ग में भगवत्सुख की प्रधानता है।
रथयात्रा का वर्णन अनेक पुराणादि में प्राप्त होता है जिस प्रकार श्रीपुरुषोत्तमजी उत्सवप्रतान ग्रन्थ में
इस रथयात्रा का उल्लेख स्कन्दपुराण में से श्लोकों का उध्दरण लेकर कर रहे हैं---
गुण्डिचाख्याम् महायात्राम् प्रकुर्वीथा: क्षितीश्वर.....आषाढस्यसितेपक्षे द्वितीया पुष्यसंयुता।
तस्यां रथे समारोप्य रामं मां भद्रया सह। महोत्सवम् प्रवर्त्याथ प्रीणयेत द्विजान् बहून् ........
अर्थात्- हे राजन मेरी गुण्डीचा महायात्रा के उत्सव को करना चाहिए, आषाढ शुक्लपक्ष की पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वितीया के दिन सुभद्रा और श्रीबलरामजी के साथ मुझे रथ में बैठा कर महोत्सव करें। स्कन्द पुराण में कहे गए इन वचनों का आश्रय लेकर श्रीपुरुषोत्तमजी आज्ञा करते हैं कि-
"तेन रथारोहणं गुण्डीचा मण्डप गमनार्थं तद् यात्रा अङ्ग भूतं च शिष्टास्तु केवलमपि प्राधान्येन कुर्वन्ति"
इसका भावार्थ यह है कि नव दिनों तक गुण्डीचा मण्डप जाना आना,
यह रथ यात्रा का अंग है जगदीश में, परन्तु शिष्टलोग गुण्डीचा मण्डप न ले जाते हुए भगवान को केवल रथारोहण कराते हैं।
श्रीजगन्नाथपुरी में जिस तरह श्रीबलरामजी एवं श्रीसुभद्राजी को प्रभु के साथ रथ में पधराकर भगवान जगन्नाथ सबको दर्शन देने के लिए राजमार्ग पर पधारते हैं और सभी को दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं, परन्तु पुष्टिसम्प्रदाय में प्रभु की रथयात्रा राजमार्गो पर नही निकलती, अपने यहाँ अति गूढ़ भाव हैं, पुष्टिपुरुषोत्तम प्रभु रथ में विराजकर व्रज भक्तों के घर पधारते हैं और सभी भगवत् व्यसन को प्राप्त हुए भक्तों के मनोरथ पूर्ण करते हैं, कहीं कहीं बाल भाव से भगवान रथ में विराजकर नन्दालय के आंगन में ही रथ यात्रा की लीला करते हैं प्रभु के इस बालभाव को श्रीहरिरायजी एक कीर्तन में इस प्रकार व्यक्त कर रहे हैं-
मैया मैं रथ चढ़ डोलुंगो। घर घर ते सङ्ग खेलन को गोप सखन कों बोलुंगो.....
इसप्रकार माँ के बालभाव को पोषण देने हेतु, श्रीयशोदा जी के भाव से श्रीनंदनंदन रथ पर विराजते हैं,
और समस्त गोपीजनो के भाव से प्रभु रथ में विराजकर निकुञ्ज लीला के भाव द्वारा रथयात्रा लीला के माध्यम से चारों यूथ की स्वामिनियों के स्नेह का पोषण करते हैं.
इसीप्रकार श्रीसूरदासजी ने प्रभु की निकुञ्जभावमयी व्रज की रथयात्रा को एक कीर्तन द्वारा वर्णन किया है और यह मेरा प्रिय कीर्तन है जो श्रीमथुरेशप्रभु के सनमुख शयन में गाया जाता हैं-
सुंदर वदन सुख सदन श्याम को निरख नैन मन थाक्यो।...............सूरदास प्रभु सर्वस्व लेके हँसत हँसत रथ हाँक्यो।
स्वमार्गीय रथयात्रा के अनुपम रसमय भाव को श्रीगोपीनाथप्रभुचरण ने भी प्रकट किया है-
मनोरथात्मकरथे राथात्मात्मन् हरे मम।
श्रीकृष्णस्योपवेशार्थम् अधिवासं कुरू प्रभो।।१।।
मनोराथात्मकः कृष्ण ! कल्पितोयं रथस् तव।
पूरयात्रोपसंविश्य गोपीवन् मन्मनोरथम् ।।२।।
श्रीकृष्ण ! रथमारुह्य सरामेण सुभद्रया।
पाहि मां भक्तिदानेन दुःखसंसारसागरात्।।३।।
यहाँ श्रीगोपीनाथ प्रभुचरण का भाव यह है कि जिस प्रकार आपने गोपीजनों के मनोरथ रूपी रथ में विराजकर उनके मनोरथ पूर्ण किये थे उसी प्रकार हे प्रभु आप मेरे द्वारा कल्पित इस मनोरथ रूपी रथ में विराजकर व्रजभक्तों की तरह मेरे भी मनोरथ पूर्ण करें।
हे श्रीकृष्ण! श्रीबलरामजी एवं श्रीसुभद्राजी सहित रथ में विराजकर मुझे भक्तिदान के द्वारा दुखरूपी संसारसागर से मेरी रक्षा करें।
श्रीगोपीनाथजी के इन श्लोकों पर रश्मिकार श्रीगोपेश्वरजी की टीका प्राप्त होती है। इन श्लोकों की व्याख्या करते हुए श्रीगोपेश्वरजी ने शास्त्रीय एवं भावनात्मक पक्ष को प्रकट किया है। श्रीगोपेश्वरजी ने कठोपनिषद् आदि के वाक्यों का आश्रय लेकर इस रथयात्रा का तात्विक विवेचन किया है।
रथयात्रा के दिन ही श्रीमहाप्रभुश्रीवल्लभाचार्यचरण ने आसुरव्यामोहलीला करते हुये नित्य लीला में प्रवेश किया था, इसलिए आज का दिन श्रीआचार्यचरण द्वारा दिए गए अंतिम उपदेशों को विशेषरूप से स्मरण करने का है
यदा बहिर्मुखा यूयं भविष्यथ कथंचन।
तदा कालप्रवाहस्था देहचित्तादयोऽप्युत।
सर्वथा भक्षयिष्यन्ति युष्मानिति मतिर्मम।
न लौकिकः प्रभुः कृष्णो मनुते नैव लौकिकम् ।
भावस्तत्राप्यस्मदीयः सर्वस्वश्चैहिकश्च सः।
परलोकश्च तेनायं सर्वभावेन सर्वथा ।
सेव्यः स एव गोपीशो विधास्यत्यखिलं हि नः।
श्रीआचार्यचरण ने जब यह श्लोक लिखे तब ऐसा कहा जाता है कि स्वयं श्रीगोपीजनवल्लभ प्रभु ने प्रकट होकर श्रीमहाप्रभु की इस आज्ञा में डेढ श्लोक जोड़ दिये-
मयि चेदस्ति विश्वासः श्रीगोपीजनवल्लभे ।
तदा कृतार्था यूयं हि शोचनीयं न कर्हिचित् ।
मुक्तिर्हित्वाऽन्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति:।
यहाँ श्रीआचार्यचरण और स्वयं प्रभु की यह आज्ञा है कि-
अगर किसी भी तरह तुम भगवान से विमुख हो जाओगे तो काल-प्रवाह में स्थित देह तथा चित्त आदि तुम्हें पूरी तरह खा जायेंगे, यह मेरा दृढ़ मत है,भगवान श्रीकृष्ण को कभी लौकिक मत जानना। भगवान को किसी भी लौकिक वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं है, हमारा लोक परलोक भी उन्हीं से ही तो है। इस भाव को मन में स्थिर करके सर्वभाव से गोपीश्वर प्रभु श्रीकृष्ण की सेवा करनी चाहिए। वे ही तुम्हारे लिए सब कुछ करेंगे।
अगर श्रीगोपीजनवल्लभ में विश्वास है तो तुम कृतार्थ ही हो, इसमें कुछ भी विचारणीय नहीं, बहिर्मुखता को छोड़कर सदा श्रीकृष्ण के अभिमुख रहना ही तुम्हारी मुक्ति है।
अतः हम सब सदा प्रभु के सन्मुख रहें कभी भी विमुख न हो,रथयात्रा के दिन ही श्रीमहाप्रभु का लीला में प्रवेश करने पर भावात्मकरूप से ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं श्रीगोपीजनवल्लभ प्रभु श्रीवल्लभ को स्वलीला में पधराने हेतु रथ में लेने के लिए पधारे,लेकिन श्रीआचार्यचरण तो सदा ही विराज रहे हैं दैवीजीवों के लिए इसमें कोई संशय नहीं है। ऐसे दैवीजीवों के उद्धारक श्रीमदाचार्यचरण को कोटि कोटि वन्दन करते हुए मैं आप सबको को पुनः रथयात्रा की वधाई देते हुए कामना करता हूँ कि श्रीमन्मथुराधीशप्रभु आप सबके अलौकिक मनोरथ पूर्ण करते हुए सभी वल्लभीयों के रथोत्सव को सफल करें।
किमधिकम्
गोस्वामी
मिलनकुमार
शुद्धाद्वैत प्रथमपीठ (कोटा)